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शीर्षक लोकतंत्र और मतदाता-एक सिक्के के दो पहलू  

शीर्षक लोकतंत्र और मतदाता-एक सिक्के के दो पहलू  

"जनता का जनता के लिए जनता द्वारा शासन ही लोकतंत्र है।"- अब्राहम लिंकन की लोकतंत्र की यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि जनता ही सर्वोच्च है,  जनता अर्थात मतदाता। मतदाता चाहे उस दल की सरकार बना सकता है। 
लोकतंत्र की नींव है-मतदाता। इसलिए यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाना है तो मतदाता को जागरूक होकर अपने मताधिकार का उपयोग करना होगा। 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 एवं 326 के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को मताधिकार प्राप्त है; जो पागल अपराधी न हो। किसी भी नागरिक को धर्म जाति वर्ण संप्रदाय अथवा लिंग भेद के कारण मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। 
इस प्रकार भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए व्यक्ति की महत्ता को स्वीकार करता है तथा अमीर गरीब के अंतर को धर्म जाति एवं संप्रदाय के अंतर को तथा स्त्री-पुरुष के अंतर को मिटा कर प्रत्येक वयस्क नागरिक को देश की सरकार बनाने के लिए मत देने का अमूल्य अधिकार प्रदान करता है।
अब मतदाता का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है साथ ही उसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र बहुदलीय प्रणाली पर आधारित है, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को अपने एजेंडे, कार्यप्रणाली और विभिन्न प्रकारों से लुभाने की चेष्टा भी की जाती है। ऐसे समय में शिक्षित एवं जागरूक मतदाता की भूमिका लोकतंत्र के निर्माण में सर्वोच्च हो जाती है। 
जागरूक मतदाता सर्वोत्तम प्रत्याशी को अपना मत देकर लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है। जब मतदाता गुमराह होता है तो बाद में स्वयं को छला हुआ महसूस करता है और इसका दोषारोपण लोकतांत्रिक प्रणाली पर करता है। भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होते हुए भी यहां धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्रवाद आदि तत्वों का बोलबाला रहता है और ये तत्व कहीं न कहीं मतदाता को प्रभावित अवश्य करते हैं। 
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि लोकतंत्र और मतदाता दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं।  अतः आज की महती आवश्यकता है कि मतदाता को पूर्ण तरह जागरूक रहकर अपने मताधिकार का प्रयोग लोकतंत्र रूपी यज्ञ को मजबूत करने हेतु आहुति के रूप में अवश्य ही करना होगा अपने मताधिकार की शक्ति को समझना ही होगा, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसकी नीव जागरूक मतदाता के कंधों पर ही रखी है।
(लेखिका-सुश्री हेमलता शर्मा 'भोली बैन)

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