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अर्थशास्त्रियों का अनर्थशास्त्र  नोबल पुरूस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री अभिजीत बनर्जी पिछले दिनों भारत के दौरे पर थे। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा की :-

अर्थशास्त्रियों का अनर्थशास्त्र  नोबल पुरूस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री अभिजीत बनर्जी पिछले दिनों भारत के दौरे पर थे। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा की :-

अर्थशास्त्रियों का अनर्थशास्त्र 
नोबल पुरूस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री अभिजीत बनर्जी पिछले दिनों भारत के दौरे पर थे। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा की :- 
1.    ट्रेड वॉर का फायदा उठाने के लिए भारत को कंपनियों को स्थापित करने की प्रक्रिया को आसान बनाना होगा- साथ ही कनेक्टीविटी - आसान  बनाना, जमीन अधिग्रहण और आधुनिक श्रम कानूनों पर भी ध्यान देना होगा।  
2.    उन्होंने यह भी कहा की भारत के ज्यादातर गरीब उद्यमी नहीं बनना चाहते इसलिए भारत में गरीबी बड़ी समस्या है।                                                                            
श्री बनर्जी को जो नोबल पुरूस्कार मिला है वह देने वाले कौन लोग है और उनके देने के आधार क्या है यह दुनिया को कम ज्ञात है? नोबल पुरूस्कार जिन महानुभाव के नाम से स्थापित है श्री अल्फ्रेड नोबल वे हथियारों के बड़े व्यापारी थे और हथियारों की कमाई से यह पुरूस्कार स्थापित हुआ हैं। वैसे तो दुनिया के सभी वैश्विक पुरूस्कारों के पीछे की ऐसी ही कहानियां है, मेगसाय पुरूस्कार भी जिन महानुभाव के नाम से है उन्होंने अमेरिकी कारपोरेट की पूर्ति के लिए ही अपने देश के लोगों को बली का बकरा बनाया था। ऐसे ही कारपोरेट के पिट्ठूओं की गद्दारी की सेवाओं के लिए ही अमेरिकी कारपोरेट के द्वारा पुरूस्कार स्थापित करना कारपोरेट धर्म है। आखिर अंग्रेज भी तो आजादी के आंदोलन के खिलाफ उनके सेवकों को राय बहादुर आदि उपाधियों से नवाजा करते थे।  
जहां तक पहले मुद्दे का सवाल है, श्री अभिजीत बनर्जी ने ट्रेड वॉर का फायदा उठाने के लिए जो सुझाव दिए है, वे उद्योग जगत व कारपोरेट्स के ही हथियार है, जिन्हें डब्लू.टी.ओ. के माध्यम से और वैश्वीकरण के नाम से कई दशको से दुनिया के सामने परोसा जा रहा है।  
कंपनी स्थापित करने की प्रक्रिया आज भी कोई कठिन नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार का एक बड़ा तरीका है। उद्यम के नाम पर लोग कम्पनियां बनाते है, फिर अनुदान लेते है, किसानों की जमीनों का अधिग्रहण कर जमीने लेते है, कारखाना लगाया तो ठीक व न भी लगाया तो अनुदान व ऋण लेकर विदेशों की सैर करते है। बाद में कोई न कोई बहाना बता कर कारखाना बंद कर देते है और अधिग्रहित ज़मीन के मालिक बनकर उसे बेचकर अरबपति बने रहते है। श्री बनर्जी को पता नहीं है, भारत में सात लाख से अधिक कारखाने जो कंपनी के रूप में पंजीकृत है वो पहले से ही बंद है। उनके कब्जे में कई करोड़ एकड़ ज़मीन किसानों की है, तथा जिनके ऊपर सरकारी बैंकों का लाखों करोड़ों का कर्ज बकाया है जो, डूबते खातों के रूप में (एन.पी.ए. बनाकर) लगभग साफ या माफ कर दिया गया है। ट्रेड वॉर इस समय मुख्यत: अमेरिका और चीन के बीच है, इसमें कभी-कभी थोड़ी भूमिका यूरोप के देश निभाते है। ये सभी दुनिया के विकसित और संपन्न देश है, जिनकी कम्पनियां महाकाय है व दशकों से स्थापित है, और भारी मुनाफे कमाती रही है। भारत की सत्ता और खजाने पर आधारित नवजात कम्पनियां क्या इन ट्रेड वॉर प्रतिभागियों का मुकाबला कर सकेगी या आने वाले कुछ वर्षें में भी इनके लायक समर्थ बन सकेगी, यह कहना भी मुश्किल होगा? यह कुछ ऐसी कल्पना है कि जैसे कोई यह कहे की दारा सिंह जैसे दुनिया के बड़े पहलवान का मुकाबला करने के लिए बच्चा पैदा किया जाए व उसे सरकारी मदद और खुराक के पोषण से पहलवान से लड़ाया जाए। अगर श्री अभिजीत बनर्जी कारपोरेट अर्थशास्त्री नहीं होते या भारत के जमीनी अर्थशास्त्री होते तो शायद वह यह कहते की भारत सरकार को कारपोरेट वॉर का हिस्सेदार बनने की बजाय कृषि को एक लाभप्रद उद्योग के रूप में विकसित करना चाहिए जिससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है और अर्थव्यवस्था को स्थाई मजबूती मिल सकती है। वे अगर कारपोरेट के अर्थशास्त्री नहीं  होते तो शायद यह सुझाव भारत की सरकार व जनता को देते कि वह मितव्ययता और संयमित उपभोग के रास्ते का वरण कर, बापू को उनके 150वें वर्ष में कर्म श्रद्धांजलि अर्पित करें।   
दूसरा बिंदू जो उन्होंने कहा है कि भारत के गरीब ज्यादातर उद्यमी नहीं बनना चाहते इसलिए गरीबी बड़ी समस्या है। श्री बनर्जी उच्च शिक्षा प्राप्त है और वे जरूर जानते होंगे कि भारत देश की स्थति यह है कि हम दुनिया में पेट भरने के क्रम में यानि भूख मिटाने में बहुत नीचे 102वें पायदान पर है। वे यह भी जानते होंगे कि योजना आयोग के द्वारा गठित सेन गुप्ता समिति ने अपनी रपट में यह कहा था कि देश के 80 करोड़ लोगों की क्रय क्षमता 20रू. से भी कम है, उनमें से भी लगभग 30 करोड़ लोग ऐसे है जिनकी दैनिक क्रय क्षमता 10रू. से भी कम है। वह यह भी जानते होंगे कि पिछले डेढ़ दशक में लगभग पाँच लाख से अधिक किसानों ने कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या की है। इन हालात में गरीबों पर यह तोहमत लगाना की वे उद्यमी नहीं बनना चाहते। यह गरीबों का अपमान है। बहुत संभव है कि वे स्व. धीरू भाई अम्बानी का उदाहरण दें कि धीरू भाई पेट्रोल पंप पर काम करते करते कारपोरेट बन गए। मैं धीरू भाई की लगन व मेहनत को न चुनौती दे रहा हू न नकार रहा हू। मैं उम्मीद करता हू कि धीरू भाई से लेकर अभी तक अम्बानी परिवार के विशाल सम्राज्य खड़ा करने के पीछे राजसत्ता, नौकरशाही, और राजनैतिक भ्रष्टाचार का त्रि-सूत्रीय गठ-जोड़ है। मैं मानता हू कि कुछ एक अपवाद होते है, परन्तु दुनिया में यह स्थापित तथ्य है कि उद्योग लगाने के लिए पूँजी चाहिए वरना वैश्वीकरण के बाद की भारत और दुनिया की सरकारें विदेशी पूँजी निवेश का रोना क्यों रोती। 
श्री अभिजीत बनर्जी नहीं जानते या नहीं जानना चाहते कि भारत की गरीबी के पीछे दो बड़े कारण है, विषमता और बेरोजगारी। जब श्री मुकेश अम्बानी की कम्पनियां 3 माह में ग्यारह हज़ार दो सौ करोड़ का मुनाफा कमाती है, 18 फीसदी मुनाफा वृद्धि करती है तो वह यह उन एक करोड़ लोगों को गरीब बनाकर कमाती है, जिनकी क्रय क्षमता 20 रू. से कम होती है। उनके आधार पर ही अपनी संपन्नता और सफलता हासिल करती है। विश्व के बाजार में अम्बानी बंधु कहीं नजर नहीं आते, चीन या अमेरिका के ट्रेड वॉर में भिड़ने वाली किन कंपनीयों से इनका मुकाबला है या इन्होंने कभी मुकाबला किया है बतायें? श्री अभिजीत बनर्जी कृपया बताएँ कि हमारे देश की बड़ी कम्पनियां या कारपोरेट या तो अमेरीका या चीन की विशालकाय कम्पनियों की सहायक कंपनी है या पेटी कान्ट्रेक्टर है या फिर अफ्रीकी देशों में उनकी गरीबी या लाचारी का लाभ उठाकर बनने वाले बड़े जमींदार या उद्योगपति है। श्री बनर्जी को भूलना नहीं चाहिए कि अम्बानी बंधु को राफल विमान डील का पेटी कान्ट्रेक्ट मिला है, तो वह भी राजसत्ता के सहारे। अडानी को यदि आस्ट्रेलिया में खनन का ठेका मिला है तो वह भी राजसत्ता के सहारे और देश में भी यह कारपोरेट रूपी झाड़ हरे-भरे हो रहे या बढ़ रहे है तो इसमें भी राजसत्ता का हाथ है। माइक्रो क्रेडिट और स्वयं सहायता समूह गरीबों को फ्रिज, टी.वी., आदि खरीदने का पैसा देते है यह सही है। परंतु क्या माइको फाइनेंसिंग, अम्बानी, अडानी, या बिल गेट्स की पूँजी के मुकाबले पूँजी बनाने के मदद देने के लायक है। स्वयं सहायता समूह द्वारा अचार, पापड़ बनाने के माध्यम से जीने का सहारा तो मिल सकता है परंतु वह कंपनी खड़े करने और ऐसी कम्पनी याने ट्रेड वॉर के मुकाबले कंपनी खड़ा करने या पूँजी देने लायक नहीं हो सकते।  
हमारे नोबल लारेट कितने काबिल है इसका प्रमाण तो नालंदा विश्वविद्यालय के पिछले 10 वर्ष की प्रगति और खर्च करने की तुलना कर देखा जा सकता हैं श्री अमर्त्य सेन इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति बने थे। उनके वेतन और यात्राओं पर कितना खर्च हुआ और विश्वविद्यलाय का कितना विकास हुआ, यह कहानी छुपी नहीं है। हालत यह हो गये थे कि सरकार को उनसे मुक्ति लेनी पड़ी।  
श्री बनर्जी की लंबी मुलाकात प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से हो चुकी है, और यह समझ जाना चाहिए की कारपोरेट पोषक सत्ता और कारपोरेट पोषित अर्थशास्त्री का मिलन किस व्यवस्था और किस अर्थशास्त्र को जन्म देगा।  


  

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